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ओपिनियन नजरिया

भारत-अमेरिकी रिश्ते की जरूरत है लचीलापन ?

आगामी 6 जुलाई से वाशिंगटन डीसी में भारत और अमेरिका के बीच होने वाली ‘टू प्लस टू’ वार्ता स्थगित हो गई है। इस बातचीत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन और अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस शामिल होने वाले थे। माना जा रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्लादिमीर पुतिन के साथ जल्द ही बैठक होने वाली है, इसके कारण यह वार्ता स्थगित की गई है; और यदि सोशल मीडिया की चर्चाओं से कोई संकेत निकालें, तो इस बातचीत के रद्द किए जाने के पीछे ट्रंप व किम जोंग-उन की एक और संभावित मुलाकात मुख्य वजह है।
‘टू प्लस टू’ वार्ता के रद्द होने को लेकर कुछ लोगों की मुद्रा इस कदर संतोषी है कि यदि वल्र्ड कप में ग्रुप स्तर पर ही जर्मनी को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, तो दुनिया में कुछ भी हो सकता है। अनुमान यह है कि ‘टू प्लस टू’ वार्ता को जिस अप्रत्याशित तरीके से अमेरिका ने रद्द किया है, वह भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में गिरावट का ही संकेत है। जाहिर है, यह गिरावट ट्रंप प्रशासन के रुख के कारण है। वैसे, यह कटु-आकलन शायद सही साबित न हो और इस कदम को दोनों देशों के एक दशक पुराने संतोषप्रद द्विपक्षीय रिश्ते में अप्रत्याशित रणनीतिक जरूरत के रूप में देखा जाए। परमाणु मुद्दे से जुड़े इस जटिल रणनीतिक-रक्षा संबंध की नींव साल 2008 के सितंबर-अक्तूबर में रखी गई थी, और इसका श्रेय तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राजनीतिक संकल्प को जाता है, जिसकी बदौलत भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु समुदाय में विशिष्ट स्थान मिला, और वह भी तब, जबकि हम परमाणु अप्रसार संधि से दूर थे।
दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में इससे एक खास बदलाव आया, क्योंकि उससे पहले इन दोनों बडे़ लोकतंत्रों के आपसी रिश्ते को अक्सर तनावपूर्ण बताया जाता था। दरअसल, अमेरिका चाहता था कि दुनिया में परमाणु शक्ति संपन्न देशों के क्लब में चीन समेत पांच ही देश रहें, मगर भारत जोरदार तरीके से इसका विरोध करता रहा। मगर साल 2008 के बाद भारत और अमेरिका का यह खिंचाव भरा रिश्ता एक अस्थायी वचनबद्धता का बना। दरअसल, 25 वर्ष पहले, जब से बिल क्लिंटन और नरसिंह राव ने अमेरिका व भारत के असामान्य रिश्ते में लचीलापन लाने की शुरुआत की थी, तब से ही दोनों देशों के बाद के नेतृत्व- बुश-ओबामा व ट्रंप और इधर वाजपेयी-मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी ने एक स्थायी द्विपक्षीय रिश्ते को आकार देने की कोशिशें की हैं। मगर राजनीतिक अनुकूलता और रणनीतिक संस्कृति के लिहाज से अमेरिका व भारत के रिश्ते अब भी बहुत सहज नहीं हैं। अमेरिका सैन्य गठबंधनों और अपने मुफीद आर्थिक संबंधों के जरिये काम करता है, जबकि भारत गुटनिरपेक्षता साथ आगे बढ़ा है।
अलबत्ता, साल 2008 के बाद से दोनों देशों के रिश्ते में सैन्य आपूर्ति को लेकर गतिशीलता आई है और इससे जुड़े सौदे 12 अरब डॉलर की राशि को पार कर चुके हैं। इसके और अधिक बढ़़ने की संभावना है। असल में, जुलाई 2005 में परमाणु नागरिक समझौते से भी पहले जून 2005 में दोनों देशों के तत्कालीन रक्षा मंत्रियों, डोनाल्ड रम्सफील्ड और प्रणब मुखर्जी ने एक व्यापक व महत्वाकांक्षी रक्षा सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे। और इस द्विपक्षीय रिश्ते में जो भी असंगतियां पैदा हुईं, यह अब भी एक महत्वपूर्ण संबंध है और इस बात को समझने की जरूरत है।
आने वाले वक्त में ‘टू प्लस टू’ वार्ता जहां कहीं भी हो, यदि यह 2005 के रक्षा प्रोटोकॉल पर फिर से गौर करे और दोनों पक्ष उस दृष्टिकोण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाएं, जिसका खाका मई 1994 में अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए नरसिंह राव ने खींचा था- ‘भारत-अमेरिका संबंध एक नए साहसिक युग की दहलीज पर है’, तो दोनों देशों के बीच की असंगतियां उस साझा एजेंडे में शामिल की जा सकेंगी, जो किसी भी वैश्विक लोकतांत्रिक संगठन को राजनीतिक एकजुटता देता है। पर क्या राष्ट्रपति इसके लिए मानेंगे, यह बहस का मुद्दा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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